| सुरक्षित मातृत्व
मातृत्व,
जीवन में पूर्ण संतोष और आनन्द लाता है लेकिन, यह आनन्द
स्त्री के जीवन और तंदुरूस्ती के लिये कुछ खतरा भी साथ लाता
है। हांलाकि गर्भावस्था एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है
जो एक सामान्य अवधि तक चलती है, लेकिन इसे कभी भी लापरवाही
से नहीं लेना चाहिए। कोई भी गर्भावस्था माता या बच्चें के
लिये खतरे से पूरी तरह मुक्त नहीं है। राजस्थान में प्रति
एक लाख जीवित जन्मों पर 677 माताओं की मृत्यु हो जाती है।
भारत में
मातृ मृत्यु दर के मुख्य कारण निम्न हैं:-
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रक्त स्त्राव
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पूविता
(सेप्सिस)
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रक्ताल्पता
(एनीमिया)
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अवरूद्व
प्रसव
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विषरक्तता
(टोक्सीमिया)
भारत
में मातृ मृत्यु दर में कमी लाने हेतु ध्यान में रखने योग्य
बातें:-
(अ)
प्रसव पूर्व देखभाल:-
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गर्भवती होते
ही महिला को अपना पंजीकरण उप स्वास्थ्य केन्द्र/ प्राथमिक
स्वास्थ्य केन्द्र पर करवा लेना चाहिए।
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गर्भावस्था
में कम से कम तीन बार चिकित्सक/ स्वास्थ्य कार्यकर्ता
( महिला) से जॉंच करवा लेनी चाहिए।
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गर्भावस्था
में खतरे के संकेत जैसे रक्तस्त्राव , गर्भ का हिलना-डुलना
बन्द होना, उक्त रक्तचाप, चेहरे और पैरों में सूजन,
खून की कमी (हिमोग्लोबीन 7 प्रतिशत से कम), एक
महिनें में 3 किलो से अधिक वजन बढ जाना, 145 सेंमी. से
छोटे कद की स्त्री, पहले सीजेरियन ऑपरेशन और मातृ शिशु
का जन्म आदि नजर आते ही तुरन्त चिकित्सक से सम्पर्क
कराना चाहिए।
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चिकित्सक/
महिला स्वास्थ्य कार्यकता्र द्वारा बताये अनुसार आयरन
फोलीक एसिड की एक गोली नियमित रूप से 100 दिन तक आवश्यक
रूप खानी चाहिए।
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धनुषबाय
खतरनाक रोग है जो माता एवं बच्चें दोनों के लिये प्राणघातक
हो सकता है अतः पंजीकरण के समय एवं एक माह बाद टिटनेस
कर टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
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गर्भ
में पल रहे बच्चें की वृद्वि के लिये गर्भवती स्त्री
को सामान्य से अधिक भोजन करना चाहिए गर्भावस्था में
जो माताऍं ठीक से खाना नहीं ले पाती हैं उन्हे प्रसुति
के समय कई समस्याओं का सामना करना पडता है एवं बच्चे
का वजन भी निर्धारक मानक 2.5 किलोग्राम से कम होता है
अतः गर्भवती महिलाओं को अपने आहार में दाल, अण्डा,
मांस, मछली, पालक, हरी सब्जियॉं, दूध,
घी आदि का पर्याप्त मात्रा में शामिल करना चाहिए।
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गर्भवती
स्त्री को समुचित विश्राम की आवश्यकता होती है उसे भारी
काम नहीं करना चाहिए।
(ब) प्रसव
के समय एवं प्रसवोतर देखभाल:-
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किसी
स्वास्थ्य संस्था या अस्पताल में प्रसव कराना सबसे
सुरक्षित है यदि सम्भव नहीं हो तो प्रसव दाई/ स्वास्थ्य
कार्यकर्ता (महिला) /महिला स्वास्थ्य दर्शिका की
सहायता से करवाना चाहिए।
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प्रसव के समय स्वच्छता का पूरा
ध्यान रखना चाहिए।
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बच्चें
का जन्म होते ही उसे स्तनपान करावें मॉं का पहला दूध
(खीस) बच्चें के लिये अत्यन्त लाभ दायक है। अतः उसे
अवश्य पिलाये 2-3 घण्टे के अन्तराल से बच्चें को स्तनपान
कराते रहें। छः माह की आयु तक शिशु को केवल मॉं का दूध
ही देना चाहिए। -
प्रसव
के दौरा अत्यधिक रक्तस्त्राव, 12 घण्टे से अधिक प्रसव
पी्डा, 30 मिनट में नाल का नहीं निकलना, बच्चें के पैदा
होने पर न रोना। एवं बच्चें के शरीर पर पीलापन नजर आते
ही मॉं और नवजात शिशु को अविलम्ब अस्पताल ले जाना चाहिए। -
मॉं
को सामान्य से अधिक भोजन करना चाहिए। काफी मात्रा
में पानी तथा अन्य पेय पदार्थ लेने चाहिए, ताकि बच्चें
को दूध की पर्याप्त मात्रा मिल सके। मॉं को लौह तत्व
और विटामिनों की अधिक आवश्यकता होती है। अतः उसे अपने
भोजन के साथ रोजाना 100 दिन तक आयरन फोलिक एसिड की गोली
प्रतिदिन लेनी चाहिए। ये सभी राजकीय उप स्वास्थ्य केन्द्रो,
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर निःशुल्क उपलब्ध
है।
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मॉं और बच्चें को साफ रखना बहुत
आवश्यक है। मॉं को रोज साबुन से नाहाना और कपडें बदलना चाहिए। उन्हें साफ
कमरे में रखा जाना चाहिए और बिस्तर साफ होना चाहिए।
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